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त्याग का दूसरा नाम राजपूत


   राजपूत समाज के सभी महानुभवों को मेरी तरफ से जय माताजी जी ,


                त्याग का दूसरा नाम राजपूत हैं ,त्याग ही वो हत्यार हैं। जो राजपूत की पहचान हैं। जितना आदमी आराम तलब होता हैं उतना कायर होता जाता हैं। पन्ना धाय नै अपना बेटा कुर्बान नहीं क्या होता तो क्या पन्ना धाय का इतनी इज्जत होती,नहीं कारन अपने लिये तो सभी जीते हैं। औरो के लिये जो जियै तभी तो जब सिपाही शहीद होता हैं तो उसको इज्जत दी जाती हैं। इन सभी बातो से राजपूत समाज का नाता रहा हैं।
           जब लोग अपने घरों में सुरक्षित सो रहे हैं तभी एक रक्षक किसी दुश्मन से झुंझ रहा होता हैं। सभी भर पेट खाना खाकर सो जाते हैं तब एक रक्षक भूखा किसी की रक्षा कर रहा होता हैं। जब लोग अपने घरों में दिवाली मनाते हैं तब एक रक्षक गोलियों का सामना करता हैं। अर्थात इज्जत और सम्मान तभी मिलता हैं। जब आप रक्षक बनो। रक्षा करना तो राजपूत की शान समझी जाई ती हैं।
             राजपूत तो धरती पर आया ही रक्षा के लिये,राजपूत से किसी अधर्म का काम,निर्बल पर अत्याचार और अबला पर अत्याचार नहीं देखा जाता। मेरा मनना हैं राजपूत दुनिया में सिर्फ दूसरों के दुःख अपने सिरे लेने के लिये आता हैं। तभी तो राणा प्रताप और शिवाजी अंत तक जनता के लिये झुंझ ते रहे।
             
                   आज राजपूत अपने रस्ते से भटक चूका हैं कारण अपने समाज के लिये नहीं सोच कर सुबह से से शाम तक केवल पेटपूर्ति के बारे में सोचना तो फिर आम जनता आपकी इजत क्यों करेंगे। जब आप भी उनकी तरह जिंदगी जीने का काम कर रहे हो तो क्या फर्क हैं।  खान पान पर ध्यान नहीं देना। शादियों में खुले आम शराब और मांश खाना जिसका नकारात्मक प्रभाव छत्तीस जातियों पर पड़ता। अगर वास्तव में शराब और मांस खाना राजपूतो का काम होता तो महाराणा प्रताप और शिवाजी नै तो कभी नहीं खाया। और हाँ  इन महापुरुषों नै वो सभी काम किए जिनसे राजपूत समाज की मान मर्यादा बढे ,तो अगर मांश और मदीरा राजपूतो का खान पान होता तो राजपूत समाज के सभी महापुरुष जरूर खाते और पीते। लेकिन ऐसा नहीं हैं

                         खान पान ही वो सीढ़ी हैं जहां से समाज के सुधार का रास्ता शुरू होता हैं। पहनावा रहन सहन का राजपूत समाज मे विशेष महत्व हैं। क्यों की सभी समाज का अग्रणी हैं। तो राजपूत समाज को तो सही चलना होगा तभी लोग आप को इज्जत देंगे।
                    उन सभी चीजों का त्याग जरूरी हैं जिससे राजपूत समाज को निचा देखना पड़ता हैं। क्या खान पान से ही  राजपूत समाज अमर होगा ,अगर ऐसा होता तो समाज के महापुरुष कभी पीछे नहीं रहते। लेकिन उनको पता था की ये सब समाज की तरक्की और इज्जत के लिए ठीक नहीं। सो उन्होंने नहीं खाया। राजपूत समाज के पतन का कारन केवल खान पान हैं। अब जो गलत हैं वो आपके सामने हैं। अगर आप को लगता हैं की इसका त्याग आप कर सकते हो तो वो आप पर हैं
                              क्यों की मांस और मदिरा आदमी की सोच बदल देती हैं राक्षशी खान पान के कारण राजपूत रक्षक नहीं भक्षक बन जाता हैं और भक्षक कही सुधरक नहीं होता या महापुरुष नहीं होता। तो ये आप पर निर्भर करता हैं की समाज की शादी विवहा और अन्य कामो में शराब और मांस बंद होजाये।

                                           जय राजपुताना ,जय हिन्द ,जय भारत
                                                                                       
       
                                                                                मोती सिंह राठौड़ (जोइंनतरा )
                                                                                           लेखक















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