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Rajput Organisations

 इस पेज पर राजपूत समाज की सभी संस्थाओं के लिंक और नाम दिए जाएंगे। 

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मोटिवेशन मंत्र

  जिस प्रकार देव मंत्र होते हैं। जिनके जप करने से और ध्यान करने से देवताओं का संपर्क और वातावरण में एक सकारत्मक पक्ष जागरूक होता हैं। जीव हो या मानव या वृक्ष सदैव ज्ञान और उत्तम सहयोग और विचारो और कर्मो के आदान प्रदान से कड़ी दर कड़ी विकास होते रहता हैं। जीवन का सार है कि बच्चा है या आदमी या युवा जैसा ज्ञान वैसा विकास। जिस प्रकार शरीर की मांस पेशियों को खुराक की जरूरत हैं जिससे मांस पेशियों का विकास बेहतर हो सके और शरीर किसी भी आंतरिक और बाहरी मेहनत के लिए मजबूत बनकर रह सकें ठीक वैसे ही मस्तिष्क को सकारत्मक मोटिवेशन अर्थात सकारत्मक विचारो का सहयोग और साथ समय समय पर चाहिए। जिससे कि युवाओ से के बुजुर्गो और अन्य सभी को अपने जीवन के मार्ग में किसी भी बुरे और नकरात्मक समय मे मस्तिष्क को बेहतर विचारो की खुराक मिल सके। अक्सर गांव देहात हो या मंदिर मस्जिद हो या अन्य धार्मिक और सामाजिक स्थल हो सभी जगह भजन सन्त वाणी गुरु वाणी प्रवचन से लेकर लेक्चर और अन्य ना ना प्रकार से इंसान के दिल और दिमाग अर्थात जीवन के दुखों के अनुभवों को अपने मस्तिष्क और मन से निकाल कर बल और बुद्धि का प्रवाह मस्तिष्क की ...

बात छोटी पर हैं पते की

जय माता जी की,                कहते हैं की किसी नै इज्जत कमाई इस लिय हम गर्व से कहते हैं की मैं तो हराजपूत हूँ। हमने ऐसा कोई काम ही नहीं किया जिस से लोग हमारी इज्जत करे। पहले के राजपूतो की छवि से हमारा जीवन चल रहा हैं बरसात की एक रात का वो वाकया मुझे आज भी याद हैं।              मैं मेरे रिस्तेदार के गांव जा रहा था। लेकिन संयोग ऐसा हुआ की। मैं जिस बस में बैठा वो बस घूमते घूमते रात के ११ बजे गॉव पहुंची। रात अँधेरी थी। मैं अंजान था मुझे अभी लगभग तीन चार किलोमीटर और चलना था। तभी मेरे ठीक पीछे एक परिवार जो की पति पत्नी और एक छोटा बच्चा।किसी नै आकर पूछा कहाँ जाओगे। चलो हम छोड़ देंगे। हम भी उसी रस्ते जा रहे हैं। लेकिन उन्होंने मना कर दिया।तभी मेरे कानो में एक शब्द सुनाई दिया। उनको पूछो शायद राजपूत हैं।                                    पति ने मुझे पूछा आप राजपूत हो। मैंने कहा हा.क्या हुआ। पति बोल कुछ नहीं हमें भी गॉव जाना ...

गर्भ ही नर्सरी सुधार का समय

  आज की इस पोस्ट में राजपूत समाज के वास्तविक विकास और सुधार का वो सच और वास्तविकता व अपने विचार समाज तक पहुचाने की कोशिश कर रहा हूँ जोकि समय की मांग के लिए आवश्यक है।  महाभारत में एक किस्सा आता हैं  जहाँ कौरव अर्जुन को युद्ध के मैदान से दूर ले जाते हैं। और पीछे चक्रव्यूह की रचना जोकि एक युद्ध कला थी कि रचना करते है। पांडवो में एक चिंता की लहर दौड़ गयी। कि चक्रव्यूह की युद्ध कला और कौशल तो अर्जुन के पास हैं।  जबकि अर्जुन को इस युद्ध कला से दूर रखने के लिए दूर युद्ध की तरफ आकर्षित कर लिया। जब सम्पूर्ण पांडव समाज चिंता में बैठा था तब 16 साल का अभिमन्यु युधिष्ठिर को आकार प्रणाम करता हैं।  अभिमन्यु कहता हैं कि मैं इस युद्ध कौशल को जनता हूँ। लेकिन मैं चक्रव्यूह में जाने की कला तो जनता हूँ लेकिन निकलने की कला नही जानता।   सभी अचंभित होकर अभिमन्यु की तरफ देखते हैं कि 16 साल का अभिमन्यु जिसने कभी इससे पहले चक्रव्यूह युद्ध ही नही देखा और न ही युद्ध लड़ा तो फिर यह इस कला के कौशल को कैसे जनता हैं। सभी के इस प्रकार देखने और सोचने पर अभिमन्यु कहता है कि जब मैं माताश्री के ...