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बात छोटी पर हैं पते की

जय माता जी की,                कहते हैं की किसी नै इज्जत कमाई इस लिय हम गर्व से कहते हैं की मैं तो हराजपूत हूँ। हमने ऐसा कोई काम ही नहीं किया जिस से लोग हमारी इज्जत करे। पहले के राजपूतो की छवि से हमारा जीवन चल रहा हैं बरसात की एक रात का वो वाकया मुझे आज भी याद हैं।              मैं मेरे रिस्तेदार के गांव जा रहा था। लेकिन संयोग ऐसा हुआ की। मैं जिस बस में बैठा वो बस घूमते घूमते रात के ११ बजे गॉव पहुंची। रात अँधेरी थी। मैं अंजान था मुझे अभी लगभग तीन चार किलोमीटर और चलना था। तभी मेरे ठीक पीछे एक परिवार जो की पति पत्नी और एक छोटा बच्चा।किसी नै आकर पूछा कहाँ जाओगे। चलो हम छोड़ देंगे। हम भी उसी रस्ते जा रहे हैं। लेकिन उन्होंने मना कर दिया।तभी मेरे कानो में एक शब्द सुनाई दिया। उनको पूछो शायद राजपूत हैं।                                    पति ने मुझे पूछा आप राजपूत हो। मैंने कहा हा.क्या हुआ। पति बोल कुछ नहीं हमें भी गॉव जाना ...

मोटिवेशन मंत्र

  जिस प्रकार देव मंत्र होते हैं। जिनके जप करने से और ध्यान करने से देवताओं का संपर्क और वातावरण में एक सकारत्मक पक्ष जागरूक होता हैं। जीव हो या मानव या वृक्ष सदैव ज्ञान और उत्तम सहयोग और विचारो और कर्मो के आदान प्रदान से कड़ी दर कड़ी विकास होते रहता हैं। जीवन का सार है कि बच्चा है या आदमी या युवा जैसा ज्ञान वैसा विकास। जिस प्रकार शरीर की मांस पेशियों को खुराक की जरूरत हैं जिससे मांस पेशियों का विकास बेहतर हो सके और शरीर किसी भी आंतरिक और बाहरी मेहनत के लिए मजबूत बनकर रह सकें ठीक वैसे ही मस्तिष्क को सकारत्मक मोटिवेशन अर्थात सकारत्मक विचारो का सहयोग और साथ समय समय पर चाहिए। जिससे कि युवाओ से के बुजुर्गो और अन्य सभी को अपने जीवन के मार्ग में किसी भी बुरे और नकरात्मक समय मे मस्तिष्क को बेहतर विचारो की खुराक मिल सके। अक्सर गांव देहात हो या मंदिर मस्जिद हो या अन्य धार्मिक और सामाजिक स्थल हो सभी जगह भजन सन्त वाणी गुरु वाणी प्रवचन से लेकर लेक्चर और अन्य ना ना प्रकार से इंसान के दिल और दिमाग अर्थात जीवन के दुखों के अनुभवों को अपने मस्तिष्क और मन से निकाल कर बल और बुद्धि का प्रवाह मस्तिष्क की ...

त्याग का दूसरा नाम राजपूत

   राजपूत समाज के सभी महानुभवों को मेरी तरफ से जय माताजी जी ,                 त्याग का दूसरा नाम राजपूत हैं ,त्याग ही वो हत्यार हैं। जो राजपूत की पहचान हैं। जितना आदमी आराम तलब होता हैं उतना कायर होता जाता हैं। पन्ना धाय नै अपना बेटा कुर्बान नहीं क्या होता तो क्या पन्ना धाय का इतनी इज्जत होती,नहीं कारन अपने लिये तो सभी जीते हैं। औरो के लिये जो जियै तभी तो जब सिपाही शहीद होता हैं तो उसको इज्जत दी जाती हैं। इन सभी बातो से राजपूत समाज का नाता रहा हैं।            जब लोग अपने घरों में सुरक्षित सो रहे हैं तभी एक रक्षक किसी दुश्मन से झुंझ रहा होता हैं। सभी भर पेट खाना खाकर सो जाते हैं तब एक रक्षक भूखा किसी की रक्षा कर रहा होता हैं। जब लोग अपने घरों में दिवाली मनाते हैं तब एक रक्षक गोलियों का सामना करता हैं। अर्थात इज्जत और सम्मान तभी मिलता हैं। जब आप रक्षक बनो। रक्षा करना तो राजपूत की शान समझी जाई ती हैं।              राजपूत तो धरती पर आया ही रक्षा के लिये,राजपूत से ...